Tuesday, October 27, 2009

किताबें - गुलज़ार

रात पश्मीने की - रूपा कं - २००२


किताबें झान्कती हैं बन्द
अल्मारी के शीशों से
बडी हसरत से ताकती हैं
महीनो अब मुलकातें नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा
करती थीं
अब अक्सर
गुजर जाती है कम्प्युटर के
पर्दे पर

बडी बेचैन रहती हैं किताबें
इन्हे अब नीन्द मे चलने की आदत
हो गयी है
बडी हसरत से ताकती हैं

जो कदरें वो सुनाती थीं
कि जिन के सैल कभी मरते नही थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते सुनाती थीं
वो सारे उधडे उधडे हैं

कोइ सफ़हा पलट-ता हूं तो इक सिसकि
निकलती है
कई लफ़्ज़ों के माने गिर पडे हैं
बिना पत्तों के सूखे टुन्ड लगते
हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोइ माने नही उगते

बहुत सी इस्तलाहें हैं
जो मिट्टि के सिकोरों की तरह
बिखरि पडी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर
डाला


ज़ुबान पर जायका आता था जो सफ़हे
पलटने का
अब उन्गली क्लिक करने से बस इक
झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता
है पर्दे पर

खिताबों से जो जाति राब्ता था,
कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में ले लेते
कभी घुटनो को अपने रिहल की सुरत
बना कर
नीम सज़दे में पढा करते थे, छोटे
थे ज़बीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा
बाद में भी
मगर वो जो किताबो में मिला करते
थे सूखे फूल
और मह्के हुए रुक्के
किताबें मांगने, गिरने, उठाने
के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नहीं होंगे

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